5 नवम्बर को पूज्य संत श्री आशारामजी बापू की मातुश्री ब्रह्मलीन माँ महँगीबाजी (अम्माजी) का महानिर्वाण दिवस है । उनका जीवन गुरुभक्ति, सेवा, त्याग और परदुःखकातरता का अनुपम उदाहरण है । अम्माजी का जीवन कैसा आग्रहरहित, फरियादरहित था इस बारे में पूज्य बापूजी सत्संग में बताते हैं: ‘‘मैंने अपनी माँ को कभी कोई फरियाद करते हुए नहीं देखा कि ‘मुझे इसने दुःख दिया... उसने कष्ट दिया... यह ऐसा है... वह वैसा है...’
जब माँ आश्रम में रहने लगीं तब भी आश्रम की बच्चियों की कभी फरियाद नहीं... आश्रम के बच्चों की कभी फरियाद नहीं । कैसा मूक जीवन ! ऐसी आत्माएँ धरती पर कभी-कभार ही आती हैं इसीलिए यह वसुंधरा टिकी हुई है । मुझे इस बात का बड़ा संतोष है कि ऐसी तपस्विनी माता की कोख से यह शरीर पैदा हुआ है ।’’
अम्माजी की सेवा में रहनेवालीं सजनी बहन द्वारा बताया गया संस्मरण : ...और वह उठकर खड़ा हो गया
जब आश्रम का व्यापक प्रचार नहीं हुआ था तब की बात है । उस समय आश्रम में बहुत कम साधक रहते थे । अहमदाबाद में रहनेवाला मिर्चूमल नाम का एक साधक था । उसकी शादी हुई परंतु उसको संसार से वैराग्य हो गया । वह सब छोड़ के आश्रम में आ गया ।
उस समय आश्रम में कच्ची भोजनशाला थी । एक दिन लकड़ियों से जहरीला साँप निकला और उसने मिर्चूमल को काट लिया । काटते ही उसके मुँह से फेन निकलने लगा । किसी साधक ने देखा और बापूजी को आवाज दी तो गुरुदेव मोक्ष कुटीर से बाहर आ गये ।
गुरुदेव ने देखा कि ‘मुँह से फेन निकल रहा है, पूरा शरीर काला हो गया है । यह तो मरनेवाला है ।’ तो उसका सिर अपनी गोद में रख के बोले : ‘‘मिर्चू ! बोल क्या चाहिए अभी ?’’
वह बोला : ‘‘बापू ! अभी मुझे 4 संतान चाहिए, जो मुझे कंधा दें ।’’
उसने माँगा भी तो क्या माँगा ! शरीर छूट रहा है और 4 संतान चाहिए !
पूज्यश्री आँखें बंद करके शांत हो गये और संकल्प कर दिया । देखते-देखते वह मिर्चू उठकर खड़ा हो गया जैसे कुछ हुआ ही न हो । फिर गुरुदेव बोले : ‘‘तुझे संतान चाहिए तो जा घर !’’
वह घर चला गया । उसको 3 लड़के हुए । उसके बाद पति-पत्नी ने आश्रम आना बंद कर दिया । चौथी संतान लड़की हुई ।
मिर्चूमल आया अम्मा के पास । बोला : ‘‘बापू से तो कंधा देने के लिए 4 बेटे माँगे थे । यह बेटी कैसे पैदा हुई ?’’
अम्माजी बोलीं : ‘‘तुम्हारी गलती है । तुमने आश्रम आना क्यों बंद कर दिया ? फिर भी साँईं दयालु हैं इसलिए चौथी संतान बेटी के रूप में दे दी ।’’
बापूजी की सरलता और अम्माजी की गुरुनिष्ठा
1998-99 की बात है । आश्रम में शांति कुटिया में सेवा करनेवाले एक भाई को जहरीले साँप ने काट लिया । तब बापूजी दिल्ली में थे । बापूजी ने फोन पर मंत्र और पीपल के पत्ते का प्रयोग बताया । 24 घंटे हो गये, होश में नहीं आया तो डॉक्टर ने कहा : ‘‘अब यह नहीं बचेगा ।’’ तो बापूजी हवाई जहाज से अहमदाबाद आये ।
अम्माजी बापूजी को गुरुरूप में मानती थीं तो बापूजी भी अम्मा को उतना ही आदर देते थे । पूज्यश्री बोले : ‘‘अम्मा ! कुटिया की सेवा करनेवाले लड़के को साँप ने काट लिया है । आशीर्वाद दो कि मुझे सफलता मिले, मैं मंत्र-प्रयोग करने जा रहा हूँ ।’’
अम्माजी बोलीं : ‘‘मेरे से आशीर्वाद लेते हो और मिर्चूमल को ऐसे ही उठा दिया था ! उसके 4 बच्चे भी हुए । अभी मुझे भुलावे में डालते हो ?’’
बापूजी मंद-मंद मुस्कराये, फिर अस्पताल गये, मंत्र-प्रयोग किया और पीपल के पत्ते का प्रयोग किया । जहर निकलता गया और वह ठीक हो गया ।
ऐसी अपार शक्ति के धनी हैं ब्रह्मवेत्ता संत पूज्य बापूजी फिर भी कैसी सरलता है ! और अम्माजी की भी अपने पुत्र में कैसी गुरुनिष्ठा है जो भुलावे में नहीं आयीं ।
पूज्य बापूजी ने कहा था कि ‘‘मेरे से भी आगे का काम मेरी माता ने कर दिखाया । लाखों वर्षों के बाद इतिहास ने मुझ पर मेहरबानी की... नहीं-नहीं, इतिहास रचनेवाली मेरी माता ने मुझ पर एहसान किया कि मुझे गुरुरूप में निहारा । लाखों वर्ष पहले माता देवहूति ने उनके पुत्र कपिल भगवान को गुरुरूप में माना था । मेरी माता ने उस इतिहास को दोहराया है । मैं तो उनको भुलावे में डालता था लेकिन वे भुलावे में न पड़ीं ।’’
अम्माजी पूज्य बापूजी की माता होने के साथ ही एक तपस्विनी व सरलता, प्रेम और परोपकार की मूर्ति थीं, एक माँ होते हुए भी अपने पुत्र में गुरुबुद्धि रखकर गुरु के प्रति अखंड निष्ठा रखनेवालीं अनुपम विभूति थीं ।
उनकी गुरुभक्ति, श्रद्धा, विश्वास व अडिग निष्ठा ने लाखों-लाखों श्रद्धालुओं को गुरु की शरण में रहने की उत्तम सीख दी । ऐसी अम्माजी के चरणों में शत-शत नमन !