Rishi Prasad- A Spiritual Monthly Publication of Sant Sri Asharam Ji Ashram

श्राद्ध आश्विन कृष्ण पक्ष में ही क्यों ?

26 सितम्बर से 10 अक्टूबर तक श्राद्ध पक्ष (महालय) है । इसकी महत्ता-आवश्यकता तथा इससे संबंधित एक शास्त्रीय कथा पूज्य बापूजी के सत्संग में आती है : 

‘‘श्रद्धया यत्क्रियते तत् श्राद्धम् ।

‘श्रद्धा से जो पूर्वजों के लिए किया जाय उसको ‘श्राद्ध’ कहते हैं ।’

गरुड़ पुराण (धर्म कांड, प्रेत कल्प : 10.57-58) में आता है कि ‘समयानुसार श्राद्ध करने से कुल में कोई दुःखी नहीं रहता । पितरों की पूजा करके मनुष्य आयु, पुत्र, यश, स्वर्ग, कीर्ति, पुष्टि, बल, श्री, पशुधन, सुख, धन और धान्य प्राप्त करता है ।’

श्राद्ध का समय आश्विन कृष्ण पक्ष में ही क्यों ? दूसरे दिन क्यों नहीं निश्चित हुए ? शास्त्र में आता है कि ‘आश्विन मास के पितृ पक्ष में पितरों को आशा लगी रहती है कि हमारे पुत्र-पौत्र आदि हमें पिंडदान प्रदान कर संतुष्ट करेंगे ।’ यही आशा ले के वे श्राद्ध पक्ष में अंतवाहक शरीर से अपने परिवार के यहाँ जाते हैं । 

श्राद्ध-संबंधी एक कथा भी है । महाभारत के युद्ध में दानवीर कर्ण देह छोड़कर ऊर्ध्वलोक में गये और वीरोचित गति को प्राप्त हुए । मृत्युलोक में वे दान करने के लिए प्रसिद्ध थे । 

कर्ण ने दान किया था सोने, हीरे-जवाहरात का परंतु अन्नदान की उपेक्षा की थी । मर के स्वर्गलोक गये तो वहाँ सोने, जवाहरात के बीच रहने को मिला लेकिन खाने को कुछ नहीं ।

कर्ण इन्द्र से बोले : ‘‘भगवन् ! खाने की व्यवस्था... ?’’

 इन्द्र बोले : ‘‘तूने अपने पूर्वजों के नाम पर अन्नदान किया ही नहीं । सोना, हीरे-जवाहरात दान किये थे, वे ही अनंत गुना होकर तेरे को मिले हैं । अब बैठ इनके बीच ।’’

‘‘भगवन् ! मेरे को पता नहीं था । मैंने जानबूझ के अवहेलना नहीं की थी, अनजाने में अवहेलना हो गयी । कृपा कीजिये, कुछ उपाय बताइये ।’’

‘‘यह एक पक्ष (15-16 दिन) तुझे देता हूँ, मृत्युलोक में फिर से जा और जो कुछ तुझे करना है कर ।’’

मृत्युलोक में आये । अनाथ-गरीबों को दया करके भोजन कराया और साधु-संतों व ब्राह्मणों को विनती करके भोजन कराया, अपने पूर्वजों का तर्पण किया । दया और दान में फर्क है । लूले-लँगड़े, अनाथ और जो कृपा के पात्र होते हैं उन पर दया की जाती है और जो कृपा करते हैं, जो विद्वान हैं, पवित्र हैं, साधु-ब्राह्मण हैं उनके चरणों में दान किया जाता है । तो कर्ण ने अन्न का दान किया, दया की और कई लोगों को तृप्त किया । 

एक पक्ष तृप्त करके जब कर्ण स्वर्गलोक पहुँचे तो इन्द्र ने कहा : ‘‘अब तू अनंत गुना भोग इधर भोग ।’’ इस प्रकार कर्ण पितृ ऋण से मुक्त हुए ।

कर्ण बोले : ‘‘महाराज ! और कोई मेरे जैसी गलती कर जाय तो... ?’’

इन्द्र : ‘‘उसके पितरों ने कुछ किया-न किया हो परंतु इस आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में जो श्राद्ध करेगा उसके पितरों को तृप्ति मिलेगी ।’’

सर्वपितृ अमावस्या को अज्ञात मृत्युतिथि वालों, अनजान व्यक्तियों के लिए भी किया हुआ तर्पण, श्राद्ध, अर्घ्य उन तक पहुँचता है । चौदस को किया हुआ श्राद्ध जो युद्ध, आग अथवा दुर्घटना से मर गये उनको मिलता है । 

जिनका नाम, कुल-गोत्र जानते हो उनके नाम व कुल-गोत्र का चिंतन करके फिर श्राद्ध कराना चाहिए तब वहाँ ठीक से पहुँचता है । आज का अर्ध-नास्तिक और नास्तिक व्यक्ति सोचता है कि ‘मैं यहाँ खिलाऊँ, दान दूँ तो मेरे पिता आदि को वहाँ कैसे मिल जायेगा ?’ उसको यह पता नहीं कि तुम भारत में रुपये जमा करते हो और लंदन में वे पाउंड होकर मिल जाते हैं, अमेरिका में डॉलर हो के मिल जाते हैं । जब यहाँ की सरकार तुम्हारे रुपये को वहाँ के चलन में बदलकर दे सकती है तो भगवत्सत्तारूपी सर्वसमर्थ सरकार श्राद्ध में अर्पित वस्तुओं को तुम्हारे पूर्वजों के योग्य करके वे जहाँ हैं वहाँ पहुँचाने में क्या असमर्थ है ? जो परमात्मा एक बूँद पानी (वीर्य) से राजे-महाराजे बना सकता है वह ब्राह्मण या साधु-संत के आगे तुमने श्रद्धा से जो अर्पण किया, तुम्हारे उस द्रव्य को अनंत गुना करके तुम्हारे पितरों तक नहीं पहुँचा सकता है क्या ? ईश्वर की सृष्टि में सब सम्भव है ।’’

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सामूहिक श्राद्ध का लाभ लें

जिन्हें अपने पूर्वजों की परलोकगमन की तिथियाँ मालूम नहीं हैं उन्हें सर्वपितृ अमावस्या (21 सितम्बर) के दिन श्राद्धकर्म करना चाहिए । संत श्री आशारामजी आश्रम की विभिन्न शाखाओं में सर्वपितृ अमावस्या को सामूहिक श्राद्ध होता है । इसमें भाग लेने के इच्छुक नजदीकी आश्रम का सम्पर्क करें । अगर खर्चे की परवाह न हो तो अपने घर में भी जानकार, सदाचारी, व्यसनमुक्त व पवित्र ब्राह्मण से श्राद्ध करा सकते हैं । 

(श्राद्ध से संबंधित विस्तृत जानकारी हेतु पढ़ें आश्रमों में सत्साहित्य सेवा केन्द्रों पर उपलब्ध पुस्तक ‘श्राद्ध-महिमा’)